हर वो समाचार को एक बेहतरीन अंदाज में पायें जो आप अक्सर चैनल और न्यूज़ पेपर में नहीं पा सकते हैं ! इस अचार युक्त समाचार पढ़ते वक़्त आपके जीभ से निकलने वाली चटकारा कि आवाज़ इतनी जोरदार होनी चाहिए कि सत्ता और व्यवस्था में बैठे लोगों के कान के पर्दें हिल जाएँ !

Tuesday, June 28, 2011

गर्भ के दिनों में ऐश्वर्या ये खाएं और वो न खाएं !


(उम्मीद भरे) स्टोरी आइडियाज़! : तैयार हो जाइए साल भर ऐसे टीआरपी बटोरू (?) स्पेशल प्रोग्राम के लिए : हे प्रभु, तूने बड़ी कृपा की. अमिताभ का ट्विट क्या पढ़ा, मानो मन की मुराद मिल गयी. बेचारा मीडिया अफवाहें फैला फैला कर थक गया था. अब मिर्च मसाले का उपयोग हो सकेगा. साल भर के कुछ स्टोरी आइडियाज़.. :

टीवी चैनल के संपादकों और रिपोर्टरों से अनुरोध है कि वे डायरी में इन्हें नोट कर लें और समय समय पर ऐसे हालात में इन आइडियाज का तुरंत इस्तेमाल कर लें...

....अभी तक क्या कर रहे थे अभिषेक...

...आखिर कैसे सफल हुए इतना गैप रखने में...

...किस हकीम की दवा से गर्भवती हुईं ऐश...

... क्या मन्नत और मनौतियों का फल है यह चहंचहांहट...

...डॉन क्यों हुआ खुश ?...

...क्या सामान्य होगा?...

...फीगर बचाने के लिए नार्मल की पक्षधर नहीं है ऐश...

...ऐश को क्या खाना चाहिए?...

...किस नर्सिंग होम में?..

...घर पर क्यों नहीं?...

...श्वेता कब नाचेगी?...

...इलाहाबाद से आयेंगे (जापे के) लड्डू?...

..अजिताभ ने बधाई क्यों नहीं दी?...

...और अमर सिंह नाचने लगे...

..सोनिया पिघलीं, दी बधाई...

...गुड्डी बनेगी दादी...

...अभिषेक ने की शूटिंग की छुट्टी...

...लम्बू ने खरीदे छोटू के कपड़े...

...ऐश का वजन (कितना) बढ़ा?...

...तैयार है जच्चा का कमरा...

...पहले भी उम्मीद थी लेकिन...

...क्या कहते हैं आम आदमी?...

...क्या बहुत देर कर दी?....

...देरी से मातृत्व के फायदे या नुकसान?....

...अगर करिश्मा से सगाई ना टूटती तो क्या होता?...

...दादा को चाहिए पोता या पोती?...

...बाबा विश्वनाथ की कृपा...

...सिद्धि विनायक का फल, हनुमानजी का आशीर्वाद..

...साथ ही देखिएगा मालिशवाली बाई का खास इंटरव्यू...

...जच्चा का डाइट चार्ट...

...ड्राइवर करेगा रहस्योदघाटन..

...माली ने खोल दिया भेद

...प्लंबर के रूप में घुसा मीडियाकर्मी

...फलां नीम हकीम का दावा ....

यह भी हो सकता है कि ऐश की बॉडी लैंग्वेज के आधार पर कोई टीवी रिपोर्टर 'सुपर जूनियर बिग बी' का इंटरव्यू ही दिखाकर माने. आखिर हमारे टीवी चैनलों में भी कई रजनीकांत जो हैं. दरअसल टीआरपी की होड़ में मूल मुद्दों से भटक गए हैं हम !!!

लेखक प्रकाश हिंदुस्तानी इंदौर के निवासी हैं. मध्य प्रदेश के वरिष्ठ और जाने-माने पत्रकार हैं. कई मीडिया हाउसों में अपनी सेवाएं दे चुके हैं. इन दिनों स्वतंत्र पत्रकारिता और स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं.

चवन्नी की मौत, अब कैसे कहें चवन्नी छाप !


बेचारी चवन्नी, अब अपने जीवन के अंतिम पड़ाव पर है। उसकी मौत की तारीख रिजर्व बैंक ने तय कर दी और अब उसकी उल्टी गिनती शुरू हो चुकी है। बस कुछ ही घंटे शेष बचे हैं चवन्नी के। इसके बाद भले ही बाजार में वह दिख जाए पर चलेगी नहीं। क्योंकि उसकी डेड लाइन फिक्स कर दी गई है, तीस जून। जिस उम्र को बाल बच्चों का परिवार जमाने की उम्र कहा जाता है, उस उम्र में चवन्नी दिवंगत होने की कगार पर है। चवन्नी सिर्फ 54 साल की उम्र में सबका साथ छोडऩे जा रही है।

आज की नौजवान पीढ़ी ने भले ही चवन्नी के दर्शन नहीं किए हों (उन्हें तो सौ का नोट भी छोटा दिखता है) इसलिए वे यह भी जानते कि चवन्नी छाप क्या होता है, पर चवन्नी को जिन्होंने हाथ में लेकर खूब घुमाया फिराया और बाजार में चलाया, उनसे पूछो कि तब चवन्नी की तू-ती कैसे बोलती थी। चवन्नी का सुख भोखने वाले ही जानते है चवन्नी की कद्र। 1957 के वक्त चवन्नी दुनिया देखी, इसके बाद वह देखते ही देखते लोगों की चहेती बन गई। हिस्ट्री ऑफ इंडियंस क्वाइंस के मुताबिक 1957 में दुनिया देखने वाली चवन्नी का तब वजन ढाई ग्राम गोलाई 19 मिलीमीटर थी। नई मुद्रा पुरानी मुद्रा को बाहर कर देती है, यह अर्थशास्र का नियम है। इसलिए बाजार में जमने के साथ ही छोटे सिक्कों की दम फूलने लगी। उनकी इज्जत कम होने लगी और बाजार में उनका भाव नहीं रह गया।

बाजार में चवन्नी के छा जाने से पहले एक पैसे, दो पैसे, पांच पैसे, दस पैसे और बीस पैसे (तब बीस पैसे का सिक्का पीतल का भी होता था और उस पर कमल बना रहता था) का जलवा था। इन छोटी मुद्राओं में वह सब कुछ आता जो बच्चों को ललचाता था। खूब याद है दस पैसे के राजगिर की तीन लड्डू मिलते थे, वो भी शक्कर के। गुड़ के तो चार भी मिल जाते थे। गटागट की बीस गोलियां मिलती थीं। बेर इतने मिलते थे कि खा-खाकर अघा जाओ पर बेर खत्म नहीं होंगे। संतरे की गोलियां भी स्कूल जाते वक्त खरीदते थे और स्कूल से लौटते वक्त भी साथ में रहती थीं। यदि क्लास में नहीं खाईं तो। एक-दो और पांच पैसे भी बाजार में खूब चलते थे। भिखारियों के दान देने की प्रवृति रखने वाले घर से बाहर निकलते वक्त इन छोटे सिक्कों को जेब में डालना नहीं भूलते थे। ऐसे में अगर भिखारी को किसी ने दान में चवन्नी दे दी तो भिखारी इतना आशीर्वाद देता कि मानों अब अमर हो गए।

ज्यादा पुरानी बात नहीं है यह सब 1972-73 की हैं। जब पैसों का मोल समझा तो चवन्नी की बाजार में चलने की ठसक भी देखी। स्कूल में पढ़ता था तब। पढ़ाई का ककहरा सीख रहा था। खूब याद है जब ताऊ-फूफा मुझे उनके पांव, पांव खूंदने के ऐवज में खुश होकर जेब से चवन्नी निकालकर ऐसे देते थे कि मानों अपनी दौलत का एक बड़ा हिस्सा मुझे यूं ही दे रहे हों और चवन्नी हाथ में आते ही मुझे भी ऐसा लगता था कि मानों कुबेर की दौलत हाथ लग गई। इसे खर्च करने का तरीका तुरंत तलाशने लगता था कि इसमें कौन-कौन से अरमान पूरे करने हैं। किराने की दुकान पर पहुंचकर जब चवन्नी दुकानदार की ओर बढ़ाकर मनचाही चीज मांगता था तो दुकानदार भी चवन्नी हाथ में लेते हुए काफी पहले से दुकान पर पांच-दस पैसे हाथ में लिए खड़े हम उम्र बच्चों से कह देता था, ठहरो, क्या मेरे दस-बीस हाथ हैं। एक-एक करके ही तो सभी की सुनूंगा। पहले इसकी तो सुन लूं। दुकानदार चवन्नी धारकों को भाव देता था।

तब चवन्नी का यह जलवा था लेकिन फिर इसके दिन फिरते समय नहीं लगा। अर्श से फर्श पर आ गई चवन्नी, बाप अठन्नी जो आ गई और इसके साथ ही चवन्नी के साथ जुमला चिपक गया चवन्नी छाप का। कई फिल्मों ने यह जुमला सुना गया है। लोगों ने भी इसे अपनी जुबान पर बैठा लिया। बातों ही बातों में लोग लोगों की बात पसंद न आने पर कहा करते थे, क्या चवन्नी छाप बातें कर रहे हो। देखो, वह आ गया चवन्नी छाप, अब भेजा खाएगा। तब चवन्नी हेय हो चली थी और चवन्नी छाप पूरे देश में चलने लगा था। धीरे-धीरे चवन्नी की सांस फूलने लगी और लोग इसे अपनी जेब पर बोझ मानने लगे। भिखारी चवन्नी देने वालों को अपने बराबर का समझने लगे और मांग करने लगे अठन्नी की। चवन्नी जिसे चार आना भी कहा जाता था से कभी एक समय घर में पकाने लायक आलू-टमाटर मिलते थे, उससे सब्‍जी बेचने वाले कभी फोकट में मिलनी वाली धनिया भी देने से कतराने लगे।

महंगाई बढऩे लगी और आमदनी अठन्नी और खर्चा रुपया आम हो गया। हालांकि खूब कोशिशें हुईं कि चवन्नी को जिंदा रखा जाए। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने उसका आकार बदलने को कोशिश भी खूब की। उसका आकार इतना छोटा कर दिया, जितना कभी दो पैसे का होता था, लेकिन तमाम कोशिशें बेकार गईं। चवन्नी को परमगति को प्राप्त होना था और वह परमगति को कब प्राप्त होगी, इस पर रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने इस साल के शुरुआत में मुहर लगाते हुए तीस जून को उसे खत्म करने का डेथ वांरट जारी कर दिया।
लेखक प्रफुल्‍ल नायक मध्‍य प्रदेश के वरिष्‍ठ पत्रकार हैं.

Monday, June 20, 2011

जमशेदपुर की जंग !


जमशेदपुर का मैदान एक बार फिर से तैयार है। पक्ष और विपक्ष के खिलाड़ी मैंदान में उतर कर अपना-अपना पोजीसन ले चुके हैं। इस खेल को देख कर मज़ा लुटने वाले और आनंदित होने वाले भी पहुँच चुके हैं। अरे देखिएगा कही आप ये मत समझ लीजियेगा कि हम आपको कीनन स्टेडियम से क्र...िकेट मैच का लाइव कमेंट्री सुना रहे हैं। भईया हम तो सत्ता का/राजनीति का/झारखण्ड कि दुर्गति के खेल का कमेंट्री सुना रहे हैं। हमेशा कि तरह एक बार फिर से झारखण्ड में होने वाला यह चुनाव भी रास्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बना चुका है/बनाने वाला है। क्यूंकि रांची में एक साथ सत्ता कि कुर्सी पर बैठने वाले रांची से महज अस्सी माइल्स कि दुरी पर जमशेदपुर में मंच के आमने-सामने होंगे। इस संघर्ष का नाम भले ही दोस्ताना दे दिया गया हो लेकिन यदि शिबू चाचा कि चुप्पी और सुदेश भईया का युवापन जड़ा सा भी अपना धैर्य खोया तो रांची कि कुर्सी डगमगा जाएगी। मानसून के आने से चारो ओर हरियाली और मेढ़क कि टरटराहट सुनाई देनी लगी है तो वहीँ दूसरी ओर चुनाव आने से नेताओं के भी शरीर पर सफेदी और मुख से टरटराहट सुनाई देनी लगी है। इस चुनाव में सभी पार्टियाँ अपनी-अपनी दिग्गज नेताओं को मैदान में प्रत्याशी के रूप में उतारी है। इसलिए आशा यही है कि संघर्ष जानदार होगा। वैसे बाबूलाल चचा ने कह भी दिया है कि इस चुनाव के परिणाम से सभी पार्टियों का औकात पता चलेगा। वैसे यदि बाबूलाल आइपीएस को मैदान में उतार कर सोच रहे हों कि उन्होंने कोई तीर मार लिया है और जमशेदपुर कि जनता उनको समर्थन देगी तो ये सरासर गलत होगा। क्यूंकि झारखण्ड में हजारीबाग पहले से ही एक आइपीएस झेल रहा है और ये बताने कि जरुरत नहीं है कि हजारीबाग कि आज क्या हालत है। पूरा हजारीबाग चीख-चीख कर यशवंत चचा को दुहाई दे रहा है और पूछ रहा कि उन्होंने आज तक किया क्या है । बीजेपी ने भी अपने प्रदेश के मुखिया को दाव पर लगा दिया है । अब तो चुनाव में ही देखना होगा कि हमेशा से गुप-चुप रहने वाले ये प्रदेश अद्यय्क्ष जी क्या गुल खिलाते हैं। कोंग्रेस बन्ना को उतार कर सोच रही है कि उन्हें अन्ना कि तरह समर्थन मिलेगा। तो जेएम्एम् अपने हारे हुए प्रत्याशियों पर दाव लगा रही है। कुल मिलाकर ये दोस्ताना संघर्ष बड़ा ही आनंददायक होगा। देखते हैं आगे क्या होता है ? फ़िलहाल सन्नी शारद का जोहार फिर मिलते हैं........

Sunday, June 19, 2011

तम्बू डालो और व्यवस्था की बम्बू करो !


अन्ना हजारे और बाबा रामदेव की राह पर हर कोई चलने को छटपटा रहा है . अनशन और हड़ताल की तो मानो झड़ी लग गयी है . बीबी ने खाना देने में देर कर दी तो हड़ताल , बेटे को पॉकेट मनी नहीं मिली तो अनशन ..इसी से प्रेरित होकर रांची के ऑटो चालको ने धमकी दे दी है कि अगर उनके परमिट की चेकिंग हुई तो ऑटो चालक हड़ताल पर चले जायेंगे . प्रशासन भी इस धमकी पर सटक गया . बोला बिना परमिट के गाड़ी चलाओ कोई नहीं रोकेगा . वाह रे सत्याग्रह का यह आलम .. अपने पास चिंदी चोर साहब भी आये बोले छाप दीजिये अगर सेंधमारी करते पुलिस ने पकड़ा तो अनशन पर चले जायेंगे ..बिंदा डाकू भी आया बोला अगर डकैती करते हुए किसी ने रोका तो समझो कि हड़ताल तय . छिछोरे लडको ने भी अर्जी विज्ञप्ति भेजकर कहा है कि अगर लडकियों को छेड़ते हुए डिस्टर्ब किया तो राजभवन के सामने तम्बू लगा देंगे . सत्याग्रह नामक अस्त्र इतना पोपुलर होगा गांधीजी ने भी नहीं सोचा था . उन्हें पता होता कि हर वर्ग इसका इस्तेमाल करेगा तो सबके लिए अलग अलग तरह के आन्दोलन तय कर देते . भ्रष्टो के लिए अलग सत्याग्रह , चोरो के लिए अलग आन्दोलन , अपराधियों के लिए अलग अनशन और छिछोरो के लिए अलग तरह का हड़ताल . अब तो संत किस लिए आन्दोलन कर रहे हैं और चोर भाई लोग किस लिए यह पता ही नहीं चलता . सब लोग बगल में तम्बू लिए फिर रहे हैं जहाँ उनके धंधे में अड़चन लाने की कोशिश की गयी फटाक से दरी बिछाया तम्बू ताना और बैठ गए अनशन पर . तम्बू दरी की बिक्री बढ़ गयी है . जय हो अन्ना जय हो बाबा ...अपन भी सोच रहा हूँ कि कही डाका डाल लू या लडकियों को छेड़कर आ जाऊ..इडियट न्यूज़ वालो ने वेतन तो नहीं दिया कम से कम दरी तम्बू का तो इंतजाम कर देते ..
चलो अपन दरी तम्बू के लिए ही अनशन पर बैठने का जुगाड़ लगाने चला ..
फिलहाल तो योगेश किसलय का जोहार

Friday, June 17, 2011

दूध मेला यानि दूधो नहाओ पूतो फलो !


बचवा सन्नी ने एक फोटू लगाया है ...दुधारू मेला का ..गैया और भैंसन के बीच अर्जुन मुंडा मुस्कुरा रहे हैं ... याद आ गया लालू भैया का .. दू गो कहानी उनका बड़ा हिट है . आज सुना देते हैं ... लालू जी भैंस खरीदने गए ..तीन गो भैंस का अलग अलग दाम बताया गया ..पहिला भैंस दस किलो दूध देता है ..इसका दू गो बछड़ा है ..दाम दस हजार रूपया ..दूसरा भैंस बीस किलो दूध देता है एक गो बछड़ा है , दाम बीस हजार रूपया ..तीसरा भैंस न तो दूध देता है न बछड़ा है ..दाम तीस हजार रुपया ..लालू चौंके, बोले, तीसरका का दाम सबसे बेसी काहे जबकि ई दूधो नहीं देता न बछड़ा है ..भैंस का मालिक बोला .." हुजूर इसका कैरेक्टर भी तो देखिये ..." .दूसरका कहानी है ..लालू एक बार अमरीका गए ..वहा कम्पटीशन लगा हुआ था कि कौन बेसी दूध दुह सकता है . रूस का ग्वाला गया और पचीस किलो दूध दुह लिया ..अमरीका वाला तीस किलो दुह के निकला ...लालू भैया गए और बड़ी देरी बाद निकले और केवल एके किलो दूध निकाल सके ...सब हंसने लगा और पूछा कि का भाया लालू जी ..लालू जी बोले , साला बड़ी मुश्किल से एक किलो निकला ..का करे अपने तो गाय का दूध निकाला हमको बैल दे दिया था तबो हम एक किलो निकाले दिए ...तो भाई दूध मेला में लालू भैया की याद आ गयी ...लालू भैया ने जो रास्ता दिखाया कि बैल से भी एकाध किलो दूध निकाल ले सो झारखण्ड के नेतवन ऐसा ही कर रहे हैं ..कौनो विभाग काहे न दे दीजिये लहर गिन के पैसा बना लेते हैं ..किसी को कोई तकलीफ नहीं कि हमको दुधारू वोभाग काहे नहीं दिए ..माल हर विभाग में है ..दूहने जानना चाहिए . अब ई मेला में देखिये न कितना के वारे न्यारे होंगे .. दूध .मेला के बादे बचवा सन्नी बताएगा कि इस मेला में कौन दूधो नहाया और पूतो फला
फिलहाल अपन तो चले भैंसिया दूहने
योगेश किसलय का ..जोहार!!!!

Thursday, June 16, 2011

जय हो ई डी और आई टी की : ये बिछड़ो को मिलाये ...


झारखण्ड के घोटाला शिरोमणियो की इन दिनों बल्ले बल्ले है . मधु कोड़ा ,हरिनारायण राय , एनोस एक्का के साथ कमलेश सिंह अब अपना कैबिनेट झारखण्ड के सबसे ऐशो आराम वाले जेल बिरसा मुंडा कारागार में लगा रहे है . कभी मन ऊब गया तो रिम्स या इंटर स्टेट विज़िट की इच्छा हुई तो एम्स का चक्कर लगा लेता हैं . सिन्हा ब्रदर सरीखे सहयोगी भाई भी लोग बैठकी को गुलजार करते रहते हैं . शरीर में सोने के गहने लादने के शौक़ीन झारखंडी बप्पी लाहिरी कमलेश सिंह के तो अब और भी मजे होने वाले हैं, पता चला है कि प्रवर्तन निदेशालय उनकी पत्नी को भी गिरफ्तार कर सकती है . कमलेश भाई की पत्नी मधु सिंह जल्दी ही बिरसा मुंडा में जा सकती है . कमलेश भाई तो बम बम हैं . कल तक मधु (कोड़ा) को देखकर ही मधु की मुराद पूरी करते थे, अब तो साक्षात् मधु भाभी ही Justify Fullरौनक बिखेरेगी . सुना था कि बेटे सूर्य सोनल के पास भी लाखो के मोबाइल और कीमती सामान मिले हैं . कही बेटा भी तो परिवार की शोभा बढाने के लिए माँ पिताजी की शरण में जाने की जुगत में नहीं है . सुना है भानु भाई भी देहात छोड़कर फरारी में हैं . काहे को फरारी भाई ,पूरी जमात तो जेल में जमी बैठी है इधर उधर कहाँ भटके चल रहे हो ? .भला हो ई डी और आई टी वालो का जो बिछड़े परिवार को फिर से मिलाने की कवायद कर रहे हैं .इससे बड़ा पुण्य का काम और क्या हो सकता है . एक्का साहब भी जल्दी ही जेल में सपत्निक हो सकते हैं . ऐसा आई टी वालो का कहना है . बढ़िया है भी बिछड़ो को मिलाने का जिम्मा केवल शिर्डी वाले साईं बाबा का थोड़े ही है. इनपर तो यह सरकारी महकमा ही मेहरबान है .चलिए इस फलते फूलते परिवार के लिए हम प्रार्थना करे ....
जय हो ई डी वालो की जय हो आई टी वालो ये बिछड़ो को मिलाये ..
मै तो चला इस शाही परिवार के लिए ठंडा पहुचाने..
जोहार
योगेश किसलय .

Tuesday, June 14, 2011

लोग मरते हैं तो मर जाये , अपनी लकड़ी की टाल है साहब !


मुंबई के एक पत्रकार साथी की हत्या हो गयी .जे डे नाम के इस पत्रकार ने अंडरवर्ल्ड क्राइम को नजदीक से देखा है और लिखा है . पत्रकारों में इनकी हत्या को लेकर भारी आक्रोश है . दरअसल क्रिमीनल हो या नक्सली , आम तौर पर पत्रकारों से पंगा कोई नहीं लेता है बल्कि कई बार तो उनके आपसी सम्बन्ध समझदारी भरे होते हैं.यही वजह है कि क्राइम रिपोर्टर उन अपराधियों तक पहुच रखता है जिस तक पुलिस नहीं पहुच पाती . जे डे की हत्या पर पत्रकारों ने जुलूस प्रदर्शन भी किये . मुंबई से लेकर देश के बाकी हिस्सों में भी आक्रोश व्यक्त करने के लिए अलग अलग तरीके अपनाये गए . महाराष्ट्र सरकार की ओर से एक प्रस्ताव आया कि पत्रकारों को भी सुरक्षा गार्ड उपलब्ध कराया जायेगा . अपन भी सोचा कि अब पत्रकार भी बड़े आदमी हो गए बॉडी गार्ड लेकर चलेंगे . खुद तो स्कूटर पर चलेंगे बॉडी गार्ड भी पीछे पिस्तोल ताने स्कूटर पर जमा रहेगा . क्या आलम होगा ? पत्रकार भीड़ या जुलूस कवर करने गए हो और बॉडी गार्ड रास्ता साफ़ करवाता चल रहा हो .किसी नेता मंत्री का इंटरव्यू करने गया हो और नेता के पीछे जिस तरह बॉडी गार्ड खड़े होते हैं उसी तरह अपन लोगो के पीछे भी बॉडी गार्ड रायफल ताने अटेंशन रहेगा . गरज ये कि अपन लोग कनखिया कर टोह लेते रहेंगे कि मेरा बॉडी गार्ड ज्यादा लम्बा और चुस्त है या नेता जी का . कुल मिलाकर रुतबे का जो सवाल है . रुतबा कम न हो . कभी दफ्तर में आराम की तलब हुई तो बॉडी गार्ड को अपना पेन धराकर कुर्सी पर एक दो नींदे मार ली . आखिर बॉडी गार्ड है तो उसका कुछ उपयोग तो हो ,और बॉडी गार्ड को भी लगे कि मेरा मालिक मेरी भी सुध ले रहा है डे साहब तो शहीद हो गए लेकिन हम पत्रकारों का रुतबा बढाने की व्यवस्था करके गए हैं .
कहावत है न ..." लोग मरते हैं तो मर जाये अपनी लकड़ी की टाल है साहब " बहरहाल रुतबे के बाजार में डे साहब की मौत का सिक्का बड़ा कीमती साबित हो रहा है ...
सबपर तो लिखता हूँ ,आज अपनों पर भी लिख दिया , दोस्तों माफ़ करना !!!!
जोहार
योगेश किसलय .