हर वो समाचार को एक बेहतरीन अंदाज में पायें जो आप अक्सर चैनल और न्यूज़ पेपर में नहीं पा सकते हैं ! इस अचार युक्त समाचार पढ़ते वक़्त आपके जीभ से निकलने वाली चटकारा कि आवाज़ इतनी जोरदार होनी चाहिए कि सत्ता और व्यवस्था में बैठे लोगों के कान के पर्दें हिल जाएँ !

Sunday, June 12, 2011

पत्रकारिता पर गनौरी बाबू

गनौरी बाबु इडियट न्यूज़ में एक दिन का आये कि खुद को नेता ही समझने लगे . बोलबो किये जतना कमेन्ट मेरा न्यूज़ में मिला ओतना तो कोइयो में नहीं आया है .अपन सोचा कि फिर से अजमाकर देखा जाये .. सो बोले कि गनौरी बाबू बताईये इडियट न्यूज़ में का का चाहिए . बोले सब बढिए चल रहा है लेकिन कुछ लोग निजी टिप्पणी करने लगे हैं इससे बचिए . हम बोले, " ठीके कहते हैं कल को जाके वही होगा कि सास पुतोहिया एके होईहे भावा कुट्टन घर जइहें ".यानि कि सास बहु के झगडे में नहीं पड़ना चाहिए ,काहे कि दोनों आखिर में एके हो जायेंगे और पंचैती करने वाले को चुपचाप दुम दबा के घर चले जाना होगा . बोले , अब राजनीति तो हम भी समझने लगे हैं न ...मुखिया का चुनाव लड़ा है ...देखिये न , कभी गुरूजी और चेले में पटती नहीं थी अब दूनो एके साथै चोंच सटाए हुए हैं उधर दिल्ली का राजनीति देखिये ममता हो कि जयललिता कांग्रेस के साथे कभी हा कभी न करते रहते हैं सो आपसे कह रहे हैं कि जईसे राजनीति में न काहू से दोस्ती न काहू से बैर , होता है वैसे ही पतकारिता में भी होना चाहिए न कांग्रेस का न बीजेपी का न माया का मुलायम का , न अन्ना का न रामदेव का , नहीं तो देखिये न बड़ा बड़ा लोग कईसा बदनाम हो रहे हैं . हमने पूछा गनौरी बाबू एतना जो प्रवचन दे रहे हैं ऊ तो हम पाहिले से जानते हैं लेकिन आपका इशारा किसके तरफ है . बोले नहीं न बताएँगे नाम ...बताके हम थोड़े किसी से पंगा लेंगे , अरे हम भी राजनीति के खेलाडी हैं भले मुखिया का चुनाव हार गए लेकिन हैं तो राजनीतिबाज ही ...ऊ गनवा नहीं है ," समझने वाले समझ गए, न समझे वो अनाड़ी है " फिर कहे कि ई इडियट समाचार हंसी हंसी में व्यंग करने का मंच है .
सो भाई लोग बहिन लोग और सब अलानवा फलनवा ,.... आज के ई सम्पादकीय में हमने बिना नाम लिए कई लोगो का नाम ले लिया जिसपर जो लागू हो समझ लीजियेगा , आउर समझ में नहीं आया तो अनाड़ी बने रहिएगा
अभी तो हम चले मुंबई में एक पत्रकार भाई की हत्या पर शोक जताने ...आप भी शोक मनाईये ..
जोहार
योगेश किसलय

Friday, June 10, 2011

जूस लेकर आइये पार्टी पक्की !


अन्ना हजारे ने अनशन क्या किया देश में अनशन का सिलसिला चल निकला . स्विस बैंक से लेकर नगर निगम तक के भ्रष्टाचारियो के पीछे पड गए हैं लोग . अन्ना के बाद बाबा रामदेव बरास्ता झारखण्ड तक इस वायरस
ने हमला कर दिया. अन्ना के पदचिन्हों पर चलकर गाँधी बनने का कीड़ा कुलबुलाने लगा . रांची में बाबुलाल मरांडी इस वायरस के पहले शिकार हुए . अब रांची विवि में घोटाले को लेकर चार लोग राजभवन के सामने अनशन पर बैठ गए . अब ये चार लोगो को अपना अनशन का प्रचार भी करना पड़ता है सो खुद अनशन से उठकर प्रेस विज्ञप्ति बनाते हैं . अख़बार के दफ्तरों की खाक छानते हैं फिर अनशन पर बैठ जाते हैं चार में से तीन तो अक्सर गायब रहते हैं और चौथा दाढ़ी बढाकर अनशन का माहौल बना रहा है . लोगो को लगे भी तो कि अनशन पर हैं .चार दिन हो गया न इनका हेल्थ घटा न किसी ने अनशन तोडवाने के लिए पहल की .कल से ही अखबार और न्यूज़ चैनलों में बाबा रामदेव की हालत पर बुलेटिन जारी हो रहा है कि बाबा अब तब की हालत में है . इससे रांची के अनशनकारियो का दिल दहल गया . इसपर तुर्रा यह कि एक चैनल ने तफसील में यह भी बता दिया कि अनशन करने वाले कितने लोग अंततः खर्च हो चुके हैं . खबर देखकर रांची के अनशनकारियो की हालत और ख़राब हो गयी है कैमरे से बाहर होते ही कहने लगे आग लगे ऐसे अनशन फंशन पर अब तो ओखली में सर डाल दिया है अखबारों में भी फोटो शोटो छप गया है क्या करे ? चुपके चुपके सेटिंग करने लगे हैं कोई तो अनशन तुडवा दो ..जूस का खर्चा भी वे ही उठाएंगे शाम में पार्टी शार्टी भी हो जाएगी लेकिन जूस लेकर कोई तो आये .लेकिन भ्रष्टाचार की गंगा में तैर रहे लोग भाई लोग पर ध्यान ही नहीं दे रहे है .उन्हें अब तो यह डर लगने लगा है कि कहीं अनशन को लेकर खर्च होने वालो में उनका भी नाम न दर्ज हो जाये .सो भाई लोग इडियट न्यूज़ आपसे आग्रह करता है अनशन वन्शन के चक्कर में न पड़े भ्रष्टाचार होता है तो होने दो अपने पेट पोते का ख्याल रखो .
बहरहाल है कोई जो रांची के राजभवन पर बैठे अनशनकारियो को जूस पिला दे सारा खर्चा अनशनकारी वहां करेंगे शाम की पार्टी अलग से ....तैयार हैं तो बताएगा कल खबर पंहुचा dunga।
अभी तो अपन खाने पीने की तैयारी में चला
जोहार
योगेश किसलय

Thursday, June 9, 2011

जींस और टॉप को करें बाय, सलवार कमीज़ को अपनाएं


भारत में लड़कियों का सबसे सलीका वाला पहनावा माने जाने वाला सलवार कमीज़ विलुप्ति के कगार पर है पाश्चात्य संस्कृतियों ने इसे पूरी तरह अपनी जींस और टॉप कि जंजीरों में जकड़ लिया है रांची जैसे छोटे शहरों में यदि आप निकलें तो हर ओर कमर से नीचे सरकती जींस और नाभि से ऊपर चढ़ते टॉप का दर्शन हो सकता है लेकिन सलवार कमीज़ तो आपको खोजने से भी नहीं मिलेगी मेरी खुद कि रेडिमेड कि दुकान है पिछले दो साल से एक भी सलावार कमीज़ नहीं बिका मैं तो सुक्रगुजर हूँ बाबा का जिन्होंने सही समय में सलवार कमीज़ को सुर्ख़ियों में लाकर बाघ कि तरह विलुप्त हो रहे इस सलवार कमीज़ को फिर से नयी शुरुवात करने का मौका दे दिया है

वैसे लोग बाबा के भ्रस्टाचार के मुद्दे पर ध्यान दे रहे हों या नहीं लेकिन बाबा के सलवार कमीज़ पर हर किसी कि नज़र है। मुझे तो लगता है अब लड़कियां शान से सलवार कमीज़ पहिनेगी और कहेगी कि यही है बाबा कि राईट च्वाइस। एक समय था जब बाबा कहा करते थे कि कद्दू (लौकी ) खाओ, बाबा कि सबने सुनी और हर कोई खाने लगे। कद्दू कि बिक्री इतनी बढ़ गई कि दुकानदार से लेकर खरीदार तक अब कद्दू को कद्दू नहीं बल्कि बाबा रामदेव कहता है। इसलिए मुझे तो डर है कि कहीं सलवार कमीज़ का भी नाम बदलकर लोग बाबा रामदेव न रख दें. जब ऐसा हो जायेगा तो स्थितियां कैसी-कैसी होंगी.....राह चलते यदि लड़कियां सलवार कमीज़ में दिखी तो लोग कहेंगे वो देखो बाबा रामदेव पहन कर आ रही है. दुकान में लोग जायेंगे तो कहेंगे भईया सस्ता वाला बाबा रामदेव देना नौकरानी को देना है. भईया सूती वाला रामदेव देना जिसके साथ आराम से सो सकूँ. लड़कियां एक दुसरे को बोलेगी "क्या बात है तेरा रामदेव तो बड़ा मस्त दिख रहा है" "मुझे तो स्लीवलेस रामदेव बहुत अच्छे लगते हैं."
हमारे फ़िल्मी दुनिया वाले भी सलवार कमीज़ के पीछे हमेशा से ही लगे रहते हैं. पिछले दिनों बोजपुरी में एक गाना आया था "बड़ा जालीदार बा ताहर कुर्ती(सलवार कमीज़)" अब यदि उस गाने को रिमिक्स कर दिया जाये तो वो कुछ इस प्रकार हो जायेगा... "बड़ा जालीदार बा ताहर रामदेव"
मैंने अकबर इलाहाबादी कि एक लाइन किताब में पढ़ी थी "जब तोप मुकाबिल हो तो अख़बार निकालो" उसी को मेरे गुरु जी ने रिमिक्स किया और कहा "जब सरकार मुकाबिल हो तो सलवार निकालो" यानि कि अनशन और धरने के साथ-सहत अब सलवार भी विरोध का एक सिम्बल हो गया. तो बस सलवार निकलते रहिये और सरकार का विरोध करते रहिये.
फ़िलहाल जोहार फिर मिलते हैं......
सन्नी शारद.

.....लेकिन बड़ी तो भैंस ही है !


एक कांग्रेसी भाई से पूछा ," अक्ल बड़ी या भैंस " , छूटते ही बोला -" भैंस ". पूछा - कैसे? तपाक से बोले , " आलाकमान कहती है , " आलाकमान जो कहती है सही कहती है ? बोले - " दो सौ फीसदी सही कहती है " आलाकमान क्या कहती है ? अब वे बोलते भये --- आलाकमान बहुत कुछ बोलती है , अभी कुछ नहीं बोल रही है इसलिए जो पहले बोली थी वही अभी भी चल रहा है , आला कमान ने कहा था उत्तर प्रदेश में जंगल राज है , पूर्वोत्तर राज्यों में विकास कार्यो में तेजी लानी होगी , इस साल मानसून अच्छी हुई तो महंगाई कम होगी , हमें गरीबो की चिंता है ,सूचना का अधिकार ...नरेगा ...दक्षिण में चुनाव .......मैंने बीच में ही टोका --- जनाब पूरे देश में भ्रष्टाचार और कालाधन का मुद्दा छाया हुआ है इसपर आलाकमान ने क्या कहा --- कहाँ ? काला धन और भ्रष्टाचार कहा है, अभी तक तो आलाकमान ने कुछ कहा नहीं तो न भ्रष्टाचार है न काला धन . तब तो आपको यह भी पता नहीं होगा कि अन्ना हजारे और बाबा रामदेव क्या कर रहे हैं ?बोले -- नहीं अन्ना हजारे को तो नहीं विजय हजारे को जानता हूँ , अच्छे खिलाडी रहे है क्रिकेट में देश का बहुत नाम रोशन किया , और बाबा ? बाबा तो दुनिया में एक ही हैं हम कांग्रेसियों के लिए ,वह हैं अपने राहुल बाबा .इसलिए कौन हड़ताल पर और कौन अनशन पर हमें नहीं पता . इन छोटे मोटे कामो के लिए दिग्गी राजा और सिब्बल साहब तो हैं ही ." ...पूछा --आपलोगो की अपनी राय नहीं होती ? बोले -- आप मुझ कांग्रेसी को भ्रष्ट करने में लगे हुए हैं .अपनी राय का मतलब भ्रष्ट कांग्रेसी , गैर कांग्रेसी होना भ्रष्टाचार है आप इस भ्रष्टाचार के बारे कुछ क्यों नहीं लिखते बोलते...मै चुप लगा गया उनके सामने मेरी बोलती बंद हो गयी , सचमुच कांग्रेस के इस भ्रष्टाचार पर तो मैंने कुछ लिखा कहा नहीं ...लेकिन इस कांग्रेसी भाई को कौन समझाए बात वही न होती कि भैंस के आगे बीन बजाये ......अपनी लाचारी देख मान गया कि भैंस ही बड़ी होती है
आज तो इतना ही , कल भी इसी जगह पर मिलेंगे ...
जोहार
योगेश किसलय

Wednesday, June 8, 2011

आजा मेरी गाड़ी में बैठ जा !



कालाधन के मुद्दे पर अपन बाबा का समर्थन क्या किया लोग ताने देने लगे ---- बाबा बन जा रहे हैं संपादक जी , भगोड़े हो गए संपादक जी वगैरा वगैरा ... ऐसा है बाबा का बोल वचन आपने सुना नहीं है इसलिए या सुना भी है तो ध्यान नहीं दिया है , ध्यान भी दिया तो कलकुलेशन में मात खा गए .. अपन तो पूरा हिसाब किताब रखता है इसलिए गौर से सुनो और गुणों ,भेजे में बात को डालो और मेरे साथ मोर्चा संभालो ..बात ये है कि बाबा ने विदेश में जमा जितने काले धन का हिसाब बताया है वह अगर भारत वापस आ गया और उसे देश के सभी नागरिको के बीच बांटा गया तो एक एक आदमी को लाख लाख रूपये से ज्यादा मिलेंगे . यहाँ मुफ्त की संपादकी कर रहा हूँ बाबा की कृपा से लाख दो लाख मिल गए तो गरीब पत्रकार का भला जो हो जायेगा . अपन ने तो तैयारी भी कर ली है . बी पी एल कार्ड की जरुरत पड़े तो वह भी बनवाने की जुगत लगा ली है . परिवार के सदस्यों का फर्जी संख्या भी बढाने का सोच रखा है पत्नी को राजी कर लिया है कि असल में न सही कागजो पर ही अपन की तीन तीन बीबिया लिखने की मंजूरी दे दो. बात पत्नी को भी पैसा सुहा गया . तैयार हो गयी कि माल मिलता हो तो कृष्ण जैसा सैकड़ो पटरानी रख लीजिये अपन बर्दाश्त करूंगी . उन्होंने तो यहाँ तक कहा कि कौरवो के बाप भी बन जाईये मंजूर ! भाई लोग , लक्ष्मी की माया है कि गृहलक्ष्मी भी सौतन के नाम पर भी पुचकारे . बैठे बिठाये बाबा अपनो का कल्याण करने में जुटे हैं और आपसब हैं कि बेचारे की लंगोट खीचने में व्यस्त हो गए हैं बाबा कह रहे है आजा मेरी गाड़ी में बैठ जा और आप हैं कि जांघ खुजलाने में लगे हैं .
तो अब बताइए कितने लोग बाबा के " आशीर्वाद " से कृतार्थ होने को तैयार हैं ....
कल फिर आऊंगा तो गिनकर बाबा तक सन्देश पंहुचा दूंगा
फ़िलहाल तो जय बाबा ..
जोहार
योगेश किसलय

बिन जूता सब सून !


मन बड़ा बेचैन था ,इसलिए बिना बताये छुट्टी पर चला गया . वजह ? खबर निकालने के लिए अपने पास कोई औजार नहीं था खबर बनने की औकात नहीं थी . क्यों? अरे अपने पास जूता नहीं है न जूता और खबर में क्या सम्बन्ध है आपको पता चाल ही गया होगा टीवी पर दिग्विजय सिंह जैसे नेता भले चीख चीख कर बोलते हो लेकिन इन नेताओ की आजकल बन आयी है इन्हें काबू में करने वाले पत्रकार ही हैं .पत्रकार भाई लोग जहा भी जाते हैं नेताओ के नाड़े ढीले होने लगे हैं . डर उनके दनदनाते सवालो से नहीं बल्कि उनके जूतों से है कब मूड बिगड़ा कि खबर लेने लगे जूतों से .अरे जब ओसामा को काबू में करने वाले ओबामा को जूता छाप पत्रकारों ने नहीं बक्शा तो जनार्दन द्विवेदी की क्या औकात अगर ये नेता खबर नहीं देंगे तो जूता दिखाकर खबर निकाल लेंगे .खबर नहीं निकाल सके तो खुद खबर बन जायेंगे . अरे संपादक को क्या चाहिए मसाला भर ना .मसाला तो ऐसे निकालेंगे कि चौबीस घंटे टी आर पी मिलेगी अखबारों में भी अच्छा खासा फूटेज खायेंगे .लेकिन अपन क्या करे ? अपन तो चप्पल पहनते हैं गाहे बगाहे ही जूता से सुशोभित होते हैं . अपन को चिंता है कि खबर कैसे निकालेंगे .सो नेताओ से गुहार लगाने की सोच रहे हैं कि जूता जितना अहमियत चप्पल को भी दिया जाये . उधर नेता लोग गोलबंदी किये हुए हैं कि किसी भी प्रेस कांफ्रेंस में पत्रकारों के जूता पहन कर आने में प्रतिबन्ध लगा दिया जाये गनीमत है अपन चप्पल पहनते हैं ,सो इस आईडिया से अपन सहमत हैं लेकिन चप्पल पहन कर आने पर भी कहीं प्रतिबन्ध लग गया तो ? इतना तो मंदिर मस्जिद जाने में भी परेशानी नहीं होती है अब प्रेस कांफ्रेंस में चप्पल जूता कैसे निकालकर जाये .नेता हैं कोई देवता नहीं . पार्टी कार्यालय नहीं हुआ मंदिर की ड्योढ़ी हो गयी . भाई अपने पत्रकार भाई तो पत्रकारिता के प्रति निष्ठांवान हैं खबर तो निकालेंगे और वह भी हर कीमत पर चाहे जूता ही चमकाना क्यों ना पड़े .
कल नागा हो गया था आज सम्पादकीय लिख रहा हूँ , बताऊ क्यों .... कल जूता खरीदने गया था भाई
आज इतना ही .अगर आप नेता है तो आपका दिन शुभ हो बाकी का तो शुभ ही शुभ चल रहा है
जोहार
योगेश किसलय

Tuesday, June 7, 2011

संपादक जी बिना बताये छुट्टी पर हैं।


आज इडीयट न्यूज़ के संपादक जी बिना बताये छुट्टी पर हैं। बहुत फ़ोन घुमाया, एसएम्एस किया लेकिन कोई जवाब नहीं आया। मुझे लग रहा है एक सप्ताह बीत जाने के बाद भी मेहनताना कि बात नहीं हो पाई शायद इसलिए नाराज़ हो कर दूर चले गए हैं। लेकिन आशंका यह भी है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ किसी चौक - चौराहे पर अनशन या धरने पर बैठे होंगे। इसलिए जवाब नहीं दे पा रहे होंगे। क्यूंकि पिछले दो चार दिनों से यह एक नया ट्रेंड बन गया है। पिछले तीन दिनों से जो कोई भी फ़ोन कर रहा है बस एक ही बात पूछ रहा है "और बाबा के बारे में क्या ख्याल है?" "तुम उनके समर्थन में हो कि नहीं?" "सरकर को ऐसा नहीं करना चाहिए था " ये वो नौ सत्रह फलाना ढीकाना ।

भईया मेरा तो बाबा के बारे में हमेशा नेक ख्याल ही रहता है। ऐसी बात थोड़े ही है कि बाबा सलवार कमीज पहन लिये तो मेरा ख्याल बदल जायेगा। और ऐसी भी बात नहीं है कि सरकार बाबा के पंडाल में आंशु गैस छोड़े तभी ही आंशु आये, भईया मुझे तो आंशु तभी से आ रहें हैं जब से ये महंगाई मुह बाये खड़ी है।
अपन इ बात समझ नहीं पा रहे हैं कि सरकार महंगाई बड़ा कर जब आम लोगों को भूखा मारने का पूरा बदोबस्त करिए लिया है तो हम भूख हड़ताल पर बैठने के लिये इतना जोर क्यूँ दे रहे हैं। शायद हम सब इ बात भूल जाते हैं कि इस देश में भूखे मरने कि पूरी छुट है लेकिन भूख हड़ताल पर बैठने कि नहीं।
लेकिन दूसरी ओर यह भी बात है कि आज ऐसे-ऐसे लोग बाबा का साथ देने कि बात कर रहे हैं जो अगर न होते तो शायद उन्हें अनशन पर बैठना ही न पड़ता। वैसे कुल मिलकर कहा जाये तो बात अब काले धन और भ्रष्टाचार कि नहीं रह गयी है बल्कि इस मुद्दे का फिर से पूरी तरह राजनीतिकरण कर दिया गया है। बापू ने अपने जीवन काल में वैसी नृत्य नहीं देख पाए होंगे जो उन्होंने अपनी समाधी स्थल पर देखी। लेकिन अपुन इडीयट परिवार तो बापू का बहुत बड़ा फैन है। न बुरा देखना, न बुरा सुनना, न बुरा बोलना । इसलिए इन समझदारों से थोड़ी दुरी बना कर ही रहता हूँ। वैसे सम्पादकीय लिखते-लिखते यह खबर आ गयी है कि बाबा ने अपने समर्थकों को अनशन तोड़ देने का आदेश दे दिया है। और सरकार से बातचीत को भी तैयार हो गए हैं। लगता है अब संपादक जी आ सकते हैं। चलिए इंतज़ार करते हैं। वैसे जब इधर उधर से चुरा कर लिखिए दिए हैं तो पोस्ट करिए देते हैं। और हाँ जाते-जाते एगो बात बता देते हैं अब देखिएगा फ़ोन पर और फेसबुक पर सब इहे सवाल पूछेगा कि बाबा अनशन तोड़ने क लिये कह दिए और साकार से बात को भी तैयार हो गए हैं तो क्या समझा जाये बाबा झुक गए और लोगों कि बीच उनकी साख कम हो जाएगी। और केंद्र सरकार अपने मकशाद में कामयाब हो गयी ?
जोहार
सन्नी शारद !