हर वो समाचार को एक बेहतरीन अंदाज में पायें जो आप अक्सर चैनल और न्यूज़ पेपर में नहीं पा सकते हैं ! इस अचार युक्त समाचार पढ़ते वक़्त आपके जीभ से निकलने वाली चटकारा कि आवाज़ इतनी जोरदार होनी चाहिए कि सत्ता और व्यवस्था में बैठे लोगों के कान के पर्दें हिल जाएँ !

Wednesday, June 8, 2011

आजा मेरी गाड़ी में बैठ जा !



कालाधन के मुद्दे पर अपन बाबा का समर्थन क्या किया लोग ताने देने लगे ---- बाबा बन जा रहे हैं संपादक जी , भगोड़े हो गए संपादक जी वगैरा वगैरा ... ऐसा है बाबा का बोल वचन आपने सुना नहीं है इसलिए या सुना भी है तो ध्यान नहीं दिया है , ध्यान भी दिया तो कलकुलेशन में मात खा गए .. अपन तो पूरा हिसाब किताब रखता है इसलिए गौर से सुनो और गुणों ,भेजे में बात को डालो और मेरे साथ मोर्चा संभालो ..बात ये है कि बाबा ने विदेश में जमा जितने काले धन का हिसाब बताया है वह अगर भारत वापस आ गया और उसे देश के सभी नागरिको के बीच बांटा गया तो एक एक आदमी को लाख लाख रूपये से ज्यादा मिलेंगे . यहाँ मुफ्त की संपादकी कर रहा हूँ बाबा की कृपा से लाख दो लाख मिल गए तो गरीब पत्रकार का भला जो हो जायेगा . अपन ने तो तैयारी भी कर ली है . बी पी एल कार्ड की जरुरत पड़े तो वह भी बनवाने की जुगत लगा ली है . परिवार के सदस्यों का फर्जी संख्या भी बढाने का सोच रखा है पत्नी को राजी कर लिया है कि असल में न सही कागजो पर ही अपन की तीन तीन बीबिया लिखने की मंजूरी दे दो. बात पत्नी को भी पैसा सुहा गया . तैयार हो गयी कि माल मिलता हो तो कृष्ण जैसा सैकड़ो पटरानी रख लीजिये अपन बर्दाश्त करूंगी . उन्होंने तो यहाँ तक कहा कि कौरवो के बाप भी बन जाईये मंजूर ! भाई लोग , लक्ष्मी की माया है कि गृहलक्ष्मी भी सौतन के नाम पर भी पुचकारे . बैठे बिठाये बाबा अपनो का कल्याण करने में जुटे हैं और आपसब हैं कि बेचारे की लंगोट खीचने में व्यस्त हो गए हैं बाबा कह रहे है आजा मेरी गाड़ी में बैठ जा और आप हैं कि जांघ खुजलाने में लगे हैं .
तो अब बताइए कितने लोग बाबा के " आशीर्वाद " से कृतार्थ होने को तैयार हैं ....
कल फिर आऊंगा तो गिनकर बाबा तक सन्देश पंहुचा दूंगा
फ़िलहाल तो जय बाबा ..
जोहार
योगेश किसलय

बिन जूता सब सून !


मन बड़ा बेचैन था ,इसलिए बिना बताये छुट्टी पर चला गया . वजह ? खबर निकालने के लिए अपने पास कोई औजार नहीं था खबर बनने की औकात नहीं थी . क्यों? अरे अपने पास जूता नहीं है न जूता और खबर में क्या सम्बन्ध है आपको पता चाल ही गया होगा टीवी पर दिग्विजय सिंह जैसे नेता भले चीख चीख कर बोलते हो लेकिन इन नेताओ की आजकल बन आयी है इन्हें काबू में करने वाले पत्रकार ही हैं .पत्रकार भाई लोग जहा भी जाते हैं नेताओ के नाड़े ढीले होने लगे हैं . डर उनके दनदनाते सवालो से नहीं बल्कि उनके जूतों से है कब मूड बिगड़ा कि खबर लेने लगे जूतों से .अरे जब ओसामा को काबू में करने वाले ओबामा को जूता छाप पत्रकारों ने नहीं बक्शा तो जनार्दन द्विवेदी की क्या औकात अगर ये नेता खबर नहीं देंगे तो जूता दिखाकर खबर निकाल लेंगे .खबर नहीं निकाल सके तो खुद खबर बन जायेंगे . अरे संपादक को क्या चाहिए मसाला भर ना .मसाला तो ऐसे निकालेंगे कि चौबीस घंटे टी आर पी मिलेगी अखबारों में भी अच्छा खासा फूटेज खायेंगे .लेकिन अपन क्या करे ? अपन तो चप्पल पहनते हैं गाहे बगाहे ही जूता से सुशोभित होते हैं . अपन को चिंता है कि खबर कैसे निकालेंगे .सो नेताओ से गुहार लगाने की सोच रहे हैं कि जूता जितना अहमियत चप्पल को भी दिया जाये . उधर नेता लोग गोलबंदी किये हुए हैं कि किसी भी प्रेस कांफ्रेंस में पत्रकारों के जूता पहन कर आने में प्रतिबन्ध लगा दिया जाये गनीमत है अपन चप्पल पहनते हैं ,सो इस आईडिया से अपन सहमत हैं लेकिन चप्पल पहन कर आने पर भी कहीं प्रतिबन्ध लग गया तो ? इतना तो मंदिर मस्जिद जाने में भी परेशानी नहीं होती है अब प्रेस कांफ्रेंस में चप्पल जूता कैसे निकालकर जाये .नेता हैं कोई देवता नहीं . पार्टी कार्यालय नहीं हुआ मंदिर की ड्योढ़ी हो गयी . भाई अपने पत्रकार भाई तो पत्रकारिता के प्रति निष्ठांवान हैं खबर तो निकालेंगे और वह भी हर कीमत पर चाहे जूता ही चमकाना क्यों ना पड़े .
कल नागा हो गया था आज सम्पादकीय लिख रहा हूँ , बताऊ क्यों .... कल जूता खरीदने गया था भाई
आज इतना ही .अगर आप नेता है तो आपका दिन शुभ हो बाकी का तो शुभ ही शुभ चल रहा है
जोहार
योगेश किसलय

Tuesday, June 7, 2011

संपादक जी बिना बताये छुट्टी पर हैं।


आज इडीयट न्यूज़ के संपादक जी बिना बताये छुट्टी पर हैं। बहुत फ़ोन घुमाया, एसएम्एस किया लेकिन कोई जवाब नहीं आया। मुझे लग रहा है एक सप्ताह बीत जाने के बाद भी मेहनताना कि बात नहीं हो पाई शायद इसलिए नाराज़ हो कर दूर चले गए हैं। लेकिन आशंका यह भी है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ किसी चौक - चौराहे पर अनशन या धरने पर बैठे होंगे। इसलिए जवाब नहीं दे पा रहे होंगे। क्यूंकि पिछले दो चार दिनों से यह एक नया ट्रेंड बन गया है। पिछले तीन दिनों से जो कोई भी फ़ोन कर रहा है बस एक ही बात पूछ रहा है "और बाबा के बारे में क्या ख्याल है?" "तुम उनके समर्थन में हो कि नहीं?" "सरकर को ऐसा नहीं करना चाहिए था " ये वो नौ सत्रह फलाना ढीकाना ।

भईया मेरा तो बाबा के बारे में हमेशा नेक ख्याल ही रहता है। ऐसी बात थोड़े ही है कि बाबा सलवार कमीज पहन लिये तो मेरा ख्याल बदल जायेगा। और ऐसी भी बात नहीं है कि सरकार बाबा के पंडाल में आंशु गैस छोड़े तभी ही आंशु आये, भईया मुझे तो आंशु तभी से आ रहें हैं जब से ये महंगाई मुह बाये खड़ी है।
अपन इ बात समझ नहीं पा रहे हैं कि सरकार महंगाई बड़ा कर जब आम लोगों को भूखा मारने का पूरा बदोबस्त करिए लिया है तो हम भूख हड़ताल पर बैठने के लिये इतना जोर क्यूँ दे रहे हैं। शायद हम सब इ बात भूल जाते हैं कि इस देश में भूखे मरने कि पूरी छुट है लेकिन भूख हड़ताल पर बैठने कि नहीं।
लेकिन दूसरी ओर यह भी बात है कि आज ऐसे-ऐसे लोग बाबा का साथ देने कि बात कर रहे हैं जो अगर न होते तो शायद उन्हें अनशन पर बैठना ही न पड़ता। वैसे कुल मिलकर कहा जाये तो बात अब काले धन और भ्रष्टाचार कि नहीं रह गयी है बल्कि इस मुद्दे का फिर से पूरी तरह राजनीतिकरण कर दिया गया है। बापू ने अपने जीवन काल में वैसी नृत्य नहीं देख पाए होंगे जो उन्होंने अपनी समाधी स्थल पर देखी। लेकिन अपुन इडीयट परिवार तो बापू का बहुत बड़ा फैन है। न बुरा देखना, न बुरा सुनना, न बुरा बोलना । इसलिए इन समझदारों से थोड़ी दुरी बना कर ही रहता हूँ। वैसे सम्पादकीय लिखते-लिखते यह खबर आ गयी है कि बाबा ने अपने समर्थकों को अनशन तोड़ देने का आदेश दे दिया है। और सरकार से बातचीत को भी तैयार हो गए हैं। लगता है अब संपादक जी आ सकते हैं। चलिए इंतज़ार करते हैं। वैसे जब इधर उधर से चुरा कर लिखिए दिए हैं तो पोस्ट करिए देते हैं। और हाँ जाते-जाते एगो बात बता देते हैं अब देखिएगा फ़ोन पर और फेसबुक पर सब इहे सवाल पूछेगा कि बाबा अनशन तोड़ने क लिये कह दिए और साकार से बात को भी तैयार हो गए हैं तो क्या समझा जाये बाबा झुक गए और लोगों कि बीच उनकी साख कम हो जाएगी। और केंद्र सरकार अपने मकशाद में कामयाब हो गयी ?
जोहार
सन्नी शारद !

Monday, June 6, 2011

मुंडे मुंडे करप्शन भिन्नः


बाबा रामदेव ने भ्रष्टाचार और काला धन के खिलाफ अनशन क्या किया, धर्म निरपेक्ष दलों और स्वघोषित महानुभावो ने धनुष तान दिए। काग्रेस कहने लगी बाबा के पीछे संघ का हाथ लालू कहने लगे सांप्रदायिक शक्तिया भ्रष्टाचार कैसे मिटा सकती हैं, यहाँ तक कि कई सामाजिक संगठन भी बाबा के कपड़ो में गेरुआ रंग देखकर भड़क गए। लगता है इस देश में भ्रष्टाचार के भी अलग अलग रंग हैं। अलग-अलग धर्म है, अलग-अलग जाति है । तेलगी भ्रष्टाचार करे तो अल्पसंख्यक भ्रष्टाचार, तोगड़िया करे तो भगवा भ्रष्टाचार, राजा करे तो दलित भ्रष्टाचार, तिवारी करे तो सवर्ण भ्रष्टाचार , लालू करे तो पिछड़ा भ्रष्टाचार, कोड़ा करे तो आदिवासी भ्रष्टाचार। जिस तरह से लोग भ्रष्टाचार को परिभाषित कर रहे हैं हमें लगता है देश की करेंसी को उसी तरह बताना होगा। भ्रष्टाचार में हजार के नोट इस्तेमाल किये गए तो बुर्जुआ भ्रष्टाचार और दस बीस के नोट इस्तेमाल किये गए तो सर्वहारा भ्रष्टाचार. इन भ्रष्टाचारियो पर हर कोई उंगली उठा सकता है क्योंकि बाकी लोग धर्मनिरपेक्ष भ्रष्टाचारी है। धर्म निरपेक्षता के नाम पर सातों खून माफ़ हैं अब तो लगता है कि देश का कतरा कतरा जाति, धर्म, वर्ग, क्षेत्र के आधार पर घोषित किया जाने लगेगा। मसलन ---आम का पेड़ , यह तो धर्मनिरपेक्ष पेड़ हैं , और आवला का पेड़ यह तो संप्रदायीक है, आलू की सब्जी धर्मनिरपेक्ष तो प्याज सांप्रदायिक , दिल्ली अहमदाबाद रोड सम्प्रदियिक है तो दिल्ली लखनऊ रोड धर्मनिरपेक्ष। बनारस का आसमान सांप्रदायिक है तो अजमेर का आसमान धर्मनिरपेक्ष , गाय सांप्रदायिक है तो भैंस धर्मनिरपेक्ष . केसरिया रंग सांप्रदायिक है तो हरा धर्मनिरपेक्ष . परेशानी यह है राजनीति करने वाले तो ऐसा कर ही रहे हैं सामाजिक संगठन भी इसी तरह बंटते जा रहे हैं . अन्ना हजारे के सिपाहसालार इसलिए बाबा के अनशन में जाने से कतराते रहे क्योंकि भ्रष्टाचार की लड़ाई में बीजेपी या संघ के कुछ लोग भी झंडा उठाये नजर आ गए . क्या इस देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाने के लिए रंग , धर्म या जाति जैसी योग्यता रखना अनिवार्य है .बाबा अगर आप भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई में ईमानदार हैं तो हम इडियट परिवार उनकी ओर से माफ़ी मांगते हैं जिन्होंने लड़ाई को कुंद करने के लिए जाति धर्म रंग और क्षेत्र से जोड़कर सवाल खड़े किये हैं ॥
आज जरा ज्यादा सीरियस हो गया न ...चलिए कल से पहले जैसा ही.......
जोहार
स्थानीय संपादक (योगेश किसलय)

Saturday, June 4, 2011

बाबा ! सफ़ेद धन बचाने के लिए भी अनशन कीजिये तो जाने !


चौक पर गनौरी बाबु आज दिने में ले लिए ..और जब ऊ ले लेते हैं तो फटाफट सच उगलने लगते हैं .और सच भी अईसा कि पढ़े लिखे लोग सिर खुजाने लगे . मुखिया का चुनाव हार का गए नेताओ जईसा बोली निकलने लगा . कहने लगे भारत के नेता झूठो पाकिस्तान के हुकमरानो को पचास आतंकवादियों की लिस्ट दे रहे हैं ..अरे ऊ लोग बाहरे है इसी में देश का भलाई है ..दू गो आतंकवादी तो पकडे बईठे हैं एगो कसाब और दूसरा अफजल गुरु ..दूनो को दमाद जैसा रखे हैं ..हैदराबाद का बिरयानी खिला रहे हैं और कश्मीर का रम पिला रहे हैं . जेतना सुरक्षा मनमोहन सिंह को नहीं है उससे अधिक सुरक्षा दे रहे हैं . गनौरी बाबु ने हिसाब लगा के बताया एगो आतंकवादी पर छियालीस करोड़ का खर्चा बईठ रहा है . अगर पाकिस्तान दाउद सहित पचासों को सौंप देता है तो सोचिये कै गो छियालीस करोड़ होता है अपन हिसाब लगाया तेईस सौ करोड़ रुपया . गनौरी बाबु आगे कहीन ..ई खर्चा तो हयिये है साथे साथे ई बात का डर है कि कही इन्हें छुड़ाने के लिए ई आतंकवादी लोग पाहिले वाला फार्मूला अपनाएंगे तो देस के कै हवाई जहाज और इसके यात्री बाप बाप करके ही यात्रा करेंगे .इसलिए इनको पाकिस्ताने में रहने दिया जाये .कम से कम इनके रख रखाव का खर्चा से तो देस बचा हुआ है . और गनौरी बाबु ई भी बोले ..बाबा रामदेव काला धन निकलवाने के लिए अनसन पर बईठ गए हैं लेकिन आतंकवादियो पर खर्चा होने वाला सफ़ेद धन बचाने का नाम काहे नहीं लेते गनौरी बाबु ठीके बोल रहे हैं अब आप ही सोचिये गनौरी बाबु बोले या उनके भीतर बैठी उनकी आत्मा लेकिन यह बात सच है कि लाल पानी सच उगलवा देता है ...जय हो भोले शंकर
आज गनौरी बाबु के नाम इतना ही
कल फिर भेंट होगी लेकिन भाई पढ़िए तो गुनिये भी और गुनिये तो लिखिए भी अपन को कैसे पता चलेगा कि इडियट कैसा लिख रहा है .
जोहार

अघाइल बगुली पोठी तीत !


इस बार धोनी और क्रिकेट को लेकर इडियट पत्रकार भाई सर धुन रहे है। बड़ी मुश्किल है यह समझाना कि देश बहुत आगे बढ़ गया है . खबरची भाई लोग डायरिया ,मलेरिया ,भ्रष्टाचार , अतिक्रमण , सूखा , आतंकवाद . नक्सलवाद ,अपराध को पकडे बैठे हैं और देश है कि बाईसवी सदी की ओर बढ़ता जा रहा है . भाई आपको क्या चाहिए चैन की जिंदगी और ख़ुशी मनाने का बहाना . मनाइए न . साल भर क्रिकेट देखिये जीतते रहने का मजा लीजिये और देशप्रेम का भाव जगाकर आप खुद चैन से सो जाइये .यानि क्रिकेट खाइए क्रिकेट सोइए क्रिकेट पहनिए . लेकिन नहीं, मानेंगे नहीं .अन्ना के बाद बाबा रामदेव भ्रष्टाचार के खिलाफ परेशान परेशान है .धरना और सत्याग्रह पर बैठ जा रहे हैं . विदेशी बैंको में पैसा है तो बाबा को खुजली हो रही है . गर्व से कहिये न कि कई देशो को चलाने में भारतीय धनपशुओ का योगदान है . और छोटे मोटे देशो को तो डराने का अच्छा खासा मौका भी है कि वे हमारी बात नहीं माने तो स्विस बैंक से पैसा निकाल कर तराजू से तौलकर पूरा देश खरीद लेंगे .देश की शान एवरेस्ट से ऊपर भागा जा रहा है और ये लोग चेरापूंजी आंसू बहा रहे हैं बाबा जी देखिये भ्रष्टाचार के मामले में हम भले बदनाम हो लेकिन क्रिकेट टेस्ट रैंकिंग में हम टॉप पर है न . वन डे में भी टॉप पर लाने के देश के क्रिकेट के करता धर्ता जी जान से जुटे हैं मैच पर मैच , मैच पर मैच ....कैसे वन डे रैंकिंग में हम टॉप पर आ जाये ..जब तक हम टॉप पर नहीं आते तब तक मैचो की झड़ी लगा देंगे बी सी सी आई वाले . .और आप भी तो यही चाहते हैं न धोनी जीते धोनी कमाए हमारा मनोरंजन करे. अरे भाई लोग चार दिन की जिंदगी है दो टेस्ट देखने में बिता दीजिये दो वन डे देखने में ...दास मलूका हो या ग़ालिब सब यही बतो कह रहे हैं न . असल में आपको फुटानी इसलिए हो गया है कि अघायल बगुली पोठी तीत ( यानि खा खा कर पेट भर गया तो पोठी मछली भी तीखा लगने लगा है )
आज इतना ही, फिर मिलेंगे !
जोहर !

Friday, June 3, 2011

झारखंडी रत्न !


कद काठी, पैर में ब्लू रंग का हवाई चप्पल, चहेरे पर हल्की-हल्की पकी हुई दाड़ी, शरीर को ढकने के लिये बस साधारण सा फुलपैंट और हरे रंग का हाफ शर्ट, बीच में तीन चार बार मोबाईल कि घंटी बजी तो उससे यही सुर निकला सहिया रे सहिया...... उनकी निगाहें कंप्यूटर पर जमी थी, एक हाथ माउस पर तो दुसरे से लगातार सिगरेट कि कश के साथ मुझे से बात ! बात भी ऐसी कि कोई भी सुन कर मंत्रमुक्ध हो जाये। जब भ्रस्टाचार पर बोले तो मेरी कुर्सी हिल गयी, जब राजनीति पर बोले तो ऐसा लगा जैसे सब ऊपर का करामत है, जब नक्सलियों पर बोले तो ऐसा एहसास हुआ मानो मैं भी एक नक्सली ही हूँ। जब बात बदलाव कि हुई तो जम कर बरसे। धोनी का नाम सुन कर भड़क गए तो रामदेव और अन्ना को एक नंबर का नौटंकीबाज बता डाला। तो आइये आज इडीयट न्यूज़ पर एक ऐसे शख्सियत से आपकी मुलाकात करवाते हैं जिन्होंने पिछले तीन दशकों से रंगकर्म, कविता-कहानी, आलोचना, पत्रकारिता एवं डाक्यूमेंट्री से गहरी यारी/अभिव्यक्ति के सभी माध्यमों -प्रिंट, ऑडियो, विजुअल, ग्राफिक्स, परफॉरमेंस और वेब के साथ जम कर साझेदारी/झारखण्ड एवं राजस्थान के आदिवासी जीवन, समाज, भाषा-संस्कृति, इतिहास और पर्यावरण पर थियेटर, फिल्म और साहित्यिक माध्यमों में विशेष कार्य में अपनी एक अलग पहचान बनायीं है ! तीन घंटो कि लम्बी बातचीत को स्मृति के आधार पर लिख रहा हूँ और हाँ बताते चलूँ कि ये मेरे जीवन का पहला INTERVIEW है। मैं कई दिनों से कसम कस में था कि इडीयट न्यूज़ में पहला INTERVIEW किसका लूँ। बहुत सोचने के बाद मैंने "जोहार सहिया" के संपादक "अश्वनी कुमार पंकज" जी से अपनी इच्छा जताई तो उन्होंने सहजता से इसे स्वीकार किया। तो पेश है पंकज साहब से सन्नी शारद कि खास बातचीत :----


सन्नी शारद: सबसे पहले आपको "नमस्कार" !
के पंकज: जी नमस्कार !

शारद: अपने बारे में कुछ बताइए ?
पंकज: मैं अश्वनी कुमार पंकज. मेरा जन्म सन १९६४ में हुआ उसी साल कमयुनिस्ट पार्टी का गठन हुआ और नेहरु कि भी हत्या हुई। मैं मूलतः बिहार औरंगाबाद का रहने वाला हूँ। अपने पिता डॉ एम् एस अवधेश के सात संतानों में से एक हूँ। पिता जी एचइसी में थे इसलिए झारखण्ड से नाता जुड़ गया सो अभी तक बना हुआ है। पिछले तीस सालों से रंगकर्म से जुड़ा हुआ हूँ। फिलहाल झारखण्ड के आदिवासी भाषाओं तथा उनके इतिहास पर सक्रिय/ लोकप्रिय मासिक नागपुरी पत्रिका जोहार सहियाऔर पाक्षिक बहुभाषी अखबारजोहार दिसुम खबरका संपादन-प्रकाशन कर रहा हूँ।

शारद: तीस साल से रंगकर्म से जुड़े हुए हैं इतना लम्बा समय. आखिर इसकी प्रेरणा आपको कहाँ से मिली?
पंकज: कहीं से भी नहीं। बाबूजी पढने पर जोर देते रहे लेकिन मैं बस इस ओर ही आता चला गया।

शारद: आपको नहीं लगता कि रंगकर्म का महत्व कम होता जा रहा है और लोगों का रुझान फिल्मों कि ओर बढता जा रहा है?
पंकज: बिलकुल नहीं ! रंगकर्म का महत्व कभी कम हो ही नहीं सकता। फिल्मों में परदे पर जो दिखताहै वो हकीकत से बड़ा होता है, टीवी पर जो दिखता है वो हकीकत से छोटा होता है, लेकिन थियटर में जो देखता है वो हकीकत होता है और वो जीवंत होता है। इसमें हमेशा सच्चाई दिखता है। मैं तो बस इसे ही जीता हूँ और झारखण्ड के लगभग हर जिला और गाँव में जाकर थियटर कर चुका हूँ।

शारद: क्या आपने कभी राष्ट्रीय स्तर पर अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया है?
पंकज: (गुस्से से उठ खड़े होते हैं) राष्ट्रीय स्तर तुम किसे बोलते हो? तुम देल्ही में जा कर कोई काम करो तो वो राष्ट्रीय स्तर का हो जाता है? क्या देल्ही के मजदुर राष्ट्रीय स्तर के हैं और यहाँ के मजदुर जिला स्तर के हैं?

शारद: आपके पास इतने अवार्ड पड़े हुए हैं। सबसे बड़ा अवार्ड आपको कौन सा मिला है?
पंकज: मुझे कोई अवार्ड नहीं मिला है। और न ही मैं कभी कोई अवार्ड लेने जाता हूँ। ये सब तो मेरे घर के पते पर भेज दिया गया है। मुझे तो थू है वैसे अवार्ड पर जिसे लेने के पहले १०-१० पन्ने का फॉर्म भरना पड़े।

शारद : यदि सचमुच में थियटर इतना प्रभावकारी माद्यम है तो फिर सरकार (झारखण्ड+केंद्र) इसको बढावा देने का प्रयाश क्यूँ नहीं करती है ?
पंकज: क्यूंकि इसमें हकीकत दिखता है। सच्चाई दिखता है। सरकार इसको कैसे बढावा देगी सरकार तो उसे बढावा देगी जो लिपा पोता हुआ हो। हालाँकि सरकार ने इसके लिये कई संस्थान भी खोलें लेकिन सबके सब मृत हो गए हैं। तुम देश कि सबसे बड़ी संस्थान नेशनल स्कूल ऑफ़ ड्रामा (NSD) को ही ले लो। मान लो हर वर्ष वहाँ से बीस-पच्चीस छात्र निकलते हैं तो इस हिसाब से यदि सन २००० से भी जोड़ा जाये तो २००-२५० होते हैं आखिर ये सब कहाँ जाते हैं। तीन सालों तक सरकार इन्हें दामाद कि तरह रख कर देश का पैसा इन सबों को पढ़ाने पर खर्च करती है और ये सब फ़िल्मी दुनिया में चले जाते हैं। फिल्म वाले के लिये FTI है।

शारद: झारखण्ड कि राजनीति के बारे में आपका क्या ख्याल है ?
पंकज: झारखण्ड कि राजनीति दिक्कू के हाथ में है। भले ही दिखावे के लिये मुख्यमंत्री आदिवासी हो।

शारद: लेकिन यहाँ जितने भी बड़े घोटाले हुए उसमे आदिवासियों का ही हाथ है और था जैसे मधु कोड़ा ?
पंकज: मैंने कहा तो ये सिर्फ पोपटे हैं। असली खिलाड़ी तो परदे के पीछे है। तुम सोच सकते हो कि मधु कोड़ा पर ४००० करोड़ इलज़ाम लगा है तो जो असली खिलाड़ी है वो कितने का घोटाला किया होगा।

शारद: झारखण्ड का भविष्य कैसा होगा?
पंकज: बहुत बुरा होने वाला है। लोग जब तक सह रहे हैं तब तक। वो दिन दूर नहीं जब नक्सली भाइयों कि तरह नहीं बल्कि बीच सड़क पर लोग सत्ता में बैठे लोगों को पटक-पटक कर मार देंगे।

शारद: अभी हाल ही में अतिक्रमण पर इतना बवाल हुआ आप इसे किस नज़र से देखते हैं?
पंकज: जो हुआ बुरा हुआ। लेकिन हाँ लोग जब हल्ला किये तो तुरंत अद्यादेश आ गया और वहीँ दूसरी ओर विस्थापन के लिये आज तक सरकार कुछ क्यूँ नहीं कर पाई ? अतिक्रमण पर सब हल्ला किये मीडिया भी खूब फोटो छापते रहा। तुम्हे पता है मीडिया में कितना अतिक्रमण है? कितने लोग झारखण्ड के हैं मीडिया में? सब बाहर से आये हैं। इसलिए इन अतिक्रमणकारियों का साथ दे रहे थे।

शारद: भ्रस्टाचार सिस्टम का एक अंग बन गया है। आपको क्या लगता है अब यह ख़त्म हो पायेगा ?
पंकज: ख़त्म उसी शर्त पर होगा जब तुम इससे अलग होगे। जब खुद से बदलाव लाने कि कोशिस करोगे। तुम जब शादी करोगे तो दहेज़ लोगे तो क्या यह भ्रस्टाचार नहीं है। तुम यदि सचमुच बदलाव चाहते हो तो खुद से शुरू करो न. अंतरजातीय विवाह करो और जाती के बंधन को तोड़ दो. अपनी शादी में दहेज़ मत लो . आज से प्रण ले लो कि कोई भी ऐसी शादी में मेहमान बनकर भी नहीं जायेंगे जिस शादी में दहेज़ लेन देन हुआ हो. पहले तुम बदलो तभी समाज और देश बदलेगा. ऐसे ही फेसबुक पर बैठ कर चिल्लाने से कुछ नहीं होगा !

शारद: आपको फेसबुक अच्छा नहीं लगता क्या?
पंकज: बिलकुल नहीं सब बकवास करते हैं यहाँ। सभी अपनी विचार थोपने में लगे रहते हैं। कभी किसी ने ये जानकारी दी है कि वो जिस जगह का है उसका चौहद्दी क्या है, उसकी खासियत क्या है। बस सब अपनी राग अलापने में लगे हुए हिं। इसलिए मैंने आज तक अपना एक भी ब्लॉग नहीं बनाया है।

शारद: फेसबुक आपको बुरा लगता है फिर भी आप वहाँ हैं ?
पंकज: बस समय कि मांग है। मैं कुछ ही दिन पहले इससे जुड़ा हूँ।

शारद: वैसे इन्टरनेट कि दुनिया पर जब भी मैं बैठता हूँ तो आपको ऑनलाइन पता हूँ। आखिर इतना गहरा लगाव क्यूँ और कैसे ?
पंकज: मैं इन्टरनेट से १९९३ से जुड़ा हुआ हूँ उस समय एक भी हिंदी कि वेबसाईट नहीं थी। जब वेब दुनिया पहली हिंदी कि साईट आयी तो मैं बैचेन हो गया कि कैसे मैं अपना साईट लाउं, बहुत लोगों से मिला लेकिन किसी ने मदद नहीं कि आखिर कर खुद से एक वेबसाईट बना ली। अब मेरी कई वेबसाईट है और मैं दो दर्ज़न से भी ज्यादा अडवांस वेब साईट बना चुका हूँ। कंप्यूटर का आज तक क्लास नहीं किया फिर भी गूगल से सर्च कर कर के सभी चीज़ सीखते चले गए। मेरी यही इच्छा है कि झारखण्ड के लिये के ऐसा वेब साईट बनायें जो झारखण्ड का गूगल हो? ओर एक ऐसी वेबसाईट बनाना चाहते हैं जो हिंदी अंग्रेजी के अलावा झारखण्ड के नौ भाषावों में हो।

शारद: जब मैंने बदलाव कि बात कि तो आपने कहा कि खुद से करना चाहिए तो आपने खुद में क्या - क्या बदलाव किया है?
पंकज: मैंने वंदना टेटे से शादी करके जाती के बंधन को तोडा है। मैं आज तक वैसी शादी में नहीं गया जिसमे दहेज़ का लेन देन हुआ हो। आज तक मैंने चार चक्का गाड़ी नहीं ली है।

शारद: झारखण्ड में नक्सल एक भयानक समस्या है इससे कैसे निजात पाया जा सकता है ?
पंकज: मुझे नहीं लगता कि यह एक भयानक समस्या है। इससे अधिक समस्या तो हमारे वैवास्था में हैं। यदि तुझे यह एक समस्या लग भी रहा है तो इसे जन्म किसने दिया है ? जब तुम्हारे हक़ को कोई छिनेगा, तेरे सामने तेरी बहन का कोई रेप करेगा तो तुम क्या करोगे ? अगर इस स्थिति में लोग वैवास्था का विरोध करते हैं तो मैं उसे नक्सली नहीं मानता।

शारद: आपने वैवास्था का विरोध करने कि बात कि तो मैं पूछना चाहूँगा कि इस स्थिति में बाबा रामदेव और अन्ना हजारे के बारे में आपका क्या ख्याल है?
पंकज: दोनों एक नंबर के नौटंकीवाज़ हैं। बाबा रामदेव अपनी दुकान चलाना चाहता है तो अन्ना हजारे कोंग्रेष का एजेंट है। बाबा रामदेव जब काले धन और भ्रस्टाचार के मुद्दे को ले कर सामने आये तो अन्ना को कोंग्रेष एक एजेंट बना कर मैंदान में उतार दिया।

शारद: अच्छा जाते - जाते एक सवाल। पूरी दुनिया को जीत कर अपना माही "महेंद्र सिंह धोनी" घर आया है। आपको क्या कहना है?
पंकज: क्या खाक पूरी दुनिया जीत कर आया है तुमको पता है कितने देश खेलती है क्रिकेट ? धोनी २१ वे सदी में कुछ दुकानदारों का बनाया गया महज एक प्रोडक्ट है। अमेरिका क्रिकेट नहीं खेलता, चाइना क्रिकेट नहीं खेलता। लेकिन हम सब अंग्रेजों के खेल में फंस कर बस क्रिकेट में फंसे हुए हैं। हमारा रास्ट्रीय खेल क्रिकेट नहीं हॉकी है। क्रिकेट सफ़ेद पोश का खेल है, जबकि हॉकी मिट्टी का खेल है। मुझे शर्म आती है वैसे प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति पर जो नेशनल गेम में नहीं आती है और क्रिकेट में चली जाती है। क्या नेशनल गेम से भी देश के लिये कोई बड़ा गेम होगा। झारखण्ड में आखिर केंद्र से कोई क्यूँ नहीं आया? क्या इस नेशनल गेम से ज्यादा जरुरी प्रधानमंत्री का हवाई अड्डे का उद्घाटन में जाना जरुरी था ? क्या इस नेशनल गेम्स से ज्यादा जरुरी राष्ट्रपति का डाक टिकट के संग्रालय का उद्घाटन में जाना जरुरी था? २६ राज्यों के खिलाड़ी अपने दम पर यहाँ तक आये थे क्या उन्हें आकर सम्मान नहीं कर सकते थे?

शारद: आप से बातें करके बहुत अच्छा लगा। अपना बेशकीमती समय देने के लिये बहुत-बहुत धन्यवाद!
पंकज: जी धन्यवाद!